पितृ कैसे होते हैं खुश और नाराज

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श्राद्धों में वर्जित किए गए भोज्य पदार्थों को सेवन करने से या ब्राह्मणों को सेवन करवाने से पितर नाराज हो जाते हैं। जिससे घर में सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य का अभाव हो जाता है। परिवार के सदस्यों को जीवन के पग-पग पर मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। जो व्यक्ति अपने पितरों को प्रसन्न नहीं कर सकता वह लाख प्रयत्न करने पर भी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त नहीं कर सकता। पितर अपने दिवंगत तिथि के दिन अपने पुत्र-पौत्रों से यही अपेक्षा रखते हैं कि कोई श्रद्धापूर्वक उनके उद्धार के लिए पिण्डदान तर्पण और श्राद्ध करें।

श्राद्धों में सात पदार्थों को ग्रहण करने से पितृ बहुत खुश होते हैं जैसे गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुतप (कुश) और तिल।चना, मसूर, बड़ा उड़द, कुलथी, लहसुन, प्याज, सत्तू, रेंड, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काल सरसों की पत्ती, शतपुष्पी तथा बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में अर्पित नहीं करने चाहिए।

जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती हैं ।शास्त्रों में वर्णन मिलता है की जिस प्रकार तुलसी के अभाव में ठाकुर जी का भोजन अधूरा माना जाता है। उसी तरह से पितरों को खुश करने के लिए जितने भी भोग अर्पित कर दें मगर तुलसी से पिंड की पूजा करने पर ही पितरों की तृप्ति होती है। तृप्त होने के बाद वह गरुड़ पर सवार होकर खुशी-खुशी विष्णुलोक में वास करते हैं।

श्राद्ध सम्पन्न होने पर कौवे, गाय, कुत्ते, चींटी तथा भिखारी को भी यथा नियम भोजन वितरित करना चाहिए।साधारणत : प्रतिदिन किया जाने वाला तर्पण दोनों हाथों से किया जाता है लेकिन श्राद्ध में किया जाने वाला तर्पन केवल दाहिने हाथ से किया जाना चाहिए। तर्पण के लिए शुक्रवार, रविवार, संक्रांति, युगादि मन्वादि तिथियों में तिल का तर्पण निषिद्ध है।

तिल-तर्पण खुले हाथ से देना चाहिए। तिलों को रोओं में या हस्तमूल में लगे नहीं रहना चाहिए।यदि किसी कारण श्राद्धों में पितरों का श्राद्ध छूट गया हो तो अमावस्या के दिन सर्वप्रथम छूटे हुए श्राद्ध के निमित्त विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करना चाहिए और उसके बाद पितृ विसर्जन तर्पण करके भोजन ग्रहण करना चाहिए।

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